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शान्ति पर्व
अध्याय २७४
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भीष्म उवाच
प्रविश्य वज्रो वृत्रं तु दारय़ामास भारत |  ५७   क
दारितश्च स वज्रेण महाय़ोगी महासुरः |  ५७   ख
जगाम परमं स्थानं विष्णोरमिततेजसः ||  ५७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति