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वन पर्व
अध्याय २७४
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मार्कण्डेय़ उवाच
तां दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रस्य माय़ामिक्ष्वाकुनन्दनः |  १०   क
उवाच रामं सौमित्रिरसम्भ्रान्तो वृहद्वचः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति