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वन पर्व
अध्याय २७४
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततो हर्यश्वय़ुक्तेन रथेनादित्यवर्चसा |  १२   क
उपतस्थे रणे रामं मातलिः शक्रसारथिः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति