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वन पर्व
अध्याय २७४
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मातलिरु उवाच
इत्युक्तो राघवस्तथ्यं वचोऽशङ्कत मातलेः |  १५   क
माय़ेय़ं राक्षसस्येति तमुवाच विभीषणः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति