वन पर्व  अध्याय २७४

मार्कण्डेय़ उवाच

संवृतो राक्षसैर्घोरैर्विविधाय़ुधपाणिभिः |  २   क
अभिदुद्राव रामं स पोथय़न्हरिय़ूथपान् ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति