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शान्ति पर्व
अध्याय ११६
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युधिष्ठिर उवाच
अभिषिक्तो हि यो राजा राज्यस्थो मित्रसंवृतः |  ५   क
असुहृत्समुपेतो वा स कथं रञ्जय़ेत्प्रजाः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति