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वन पर्व
अध्याय २७४
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्ते राममर्छन्तो लक्ष्मणं च क्षपाचराः |  ९   क
अभिपेतुस्तदा राजन्प्रगृहीतोच्चकार्मुकाः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति