menu
বাংলা
महाभारत
शब्दसूची
श्लोकपादसूची
About Us
বাংলা
महाभारत
शब्दसूची
श्लोकपादसूची
About Us
शान्ति पर्व
अध्याय २७५
chevron_left
chevron_right
समङ्ग उवाच
मूढस्य दर्पः स पुनर्मोह एव; मूढस्य नाय़ं न परोऽस्ति लोकः |  १२   क
न ह्येव दुःखानि सदा भवन्ति; सुखस्य वा नित्यशो लाभ एव ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति