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शान्ति पर्व
अध्याय २७५
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समङ्ग उवाच
प्रिय़ं हि हर्षजननं हर्ष उत्सेकवर्धनः |  १७   क
उत्सेको नरकाय़ैव तस्मात्तं सन्त्यजाम्यहम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति