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वन पर्व
अध्याय २७५
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राम उवाच
अभिवादय़े त्वां राजेन्द्र यदि त्वं जनको मम |  ३६   क
गमिष्यामि पुरीं रम्यामय़ोध्यां शासनात्तव ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति