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वन पर्व
अध्याय २७५
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततो देवान्नमस्कृत्य सुहृद्भिरभिनन्दितः |  ३८   क
महेन्द्र इव पौलोम्या भार्यया स समेय़िवान् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति