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वन पर्व
अध्याय २७५
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मार्कण्डेय़ उवाच
दिव्यास्त्वामुपभोगाश्च मत्प्रसादकृताः सदा |  ४४   क
उपस्थास्यन्ति हनुमन्निति स्म हरिलोचन ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति