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वन पर्व
अध्याय २७५
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मार्कण्डेय़ उवाच
दृष्ट्वा तु रामं जानक्या समेतं शक्रसारथिः |  ४६   क
उवाच परमप्रीतः सुहृन्मध्य इदं वचः ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति