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वन पर्व
अध्याय २७५
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मार्कण्डेय़ उवाच
अथैनान्राघवः काले समानीय़ाभिपूज्य च |  ५४   क
विसर्जय़ामास तदा रत्नैः सन्तोष्य सर्वशः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति