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वन पर्व
अध्याय २७५
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मार्कण्डेय़ उवाच
किष्किन्धां तु समासाद्य रामः प्रहरतां वरः |  ५७   क
अङ्गदं कृतकर्माणं यौवराज्येऽभ्यषेचय़त् ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति