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वन पर्व
अध्याय २७५
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मार्कण्डेय़ उवाच
अभ्यर्च्य विविधै रत्नैः प्रीतिय़ुक्तौ मुदा युतौ |  ६७   क
समाधाय़ेतिकर्तव्यं दुःखेन विससर्ज ह ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति