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वन पर्व
अध्याय २७५
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मार्कण्डेय़ उवाच
उवाच च महात्मानं काकुत्स्थं दैन्यमास्थितम् |  ७   क
प्रतीच्छ देवीं सद्वृत्तां महात्मञ्जानकीमिति ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति