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शान्ति पर्व
अध्याय २७६
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नारद उवाच
यत्र धर्ममनाशङ्काश्चरेय़ुर्वीतमत्सराः |  ४४   क
चरेत्तत्र वसेच्चैव पुण्यशीलेषु साधुषु ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति