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वन पर्व
अध्याय २७६
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मार्कण्डेय़ उवाच
संहत्य निहतो वृत्रो मरुद्भिर्वज्रपाणिना |  ४   क
नमुचिश्चैव दुर्धर्षो दीर्घजिह्वा च राक्षसी ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति