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वन पर्व
अध्याय २७६
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मार्कण्डेय़ उवाच
सहाय़वति सर्वार्थाः सन्तिष्ठन्तीह सर्वशः |  ५   क
किं नु तस्याजितं सङ्ख्ये भ्राता यस्य धनञ्जय़ः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति