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शान्ति पर्व
अध्याय २८८
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हंस उवाच
विमुच्यमानः पापेभ्यो धनेभ्य इव चन्द्रमाः |  २१   क
विरजाः कालमाकाङ्क्षन्धीरो धैर्येण सिध्यति ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति