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शान्ति पर्व
अध्याय २७७
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भीष्म उवाच
यः पश्यति सुखी तुष्टो नपश्यंश्च विहन्यते |  ३२   क
यश्चाप्यल्पेन सन्तुष्टो लोकेऽस्मिन्मुक्त एव सः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति