वन पर्व  अध्याय २७७

मार्कण्डेय़ उवाच

व्रह्मचर्येण शुद्धेन दमेन निय़मेन च |  १२   क
सर्वात्मना च मद्भक्त्या तुष्टास्मि तव पार्थिव ||  १२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति