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वन पर्व
अध्याय २७७
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मार्कण्डेय़ उवाच
वरं वृणीष्वाश्वपते मद्रराज यथेप्सितम् |  १३   क
न प्रमादश्च धर्मेषु कर्तव्यस्ते कथञ्चन ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति