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वन पर्व
अध्याय २७७
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्राप्ते काले तु सुषुवे कन्यां राजीवलोचनाम् |  २३   क
क्रिय़ाश्च तस्या मुदितश्चक्रे स नृपतिस्तदा ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति