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वन पर्व
अध्याय २७७
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मार्कण्डेय़ उवाच
यौवनस्थां तु तां दृष्ट्वा स्वां सुतां देवरूपिणीम् |  ३१   क
अय़ाच्यमानां च वरैर्नृपतिर्दुःखितोऽभवत् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति