वन पर्व  अध्याय १३५

लोमश उवाच

एष रैभ्याश्रमः श्रीमान्पाण्डवेय़ प्रकाशते |  ९   क
भारद्वाजो यत्र कविर्यवक्रीतो व्यनश्यत ||  ९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति