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वन पर्व
अध्याय २७७
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मार्कण्डेय़ उवाच
मान्यानां तत्र वृद्धानां कृत्वा पादाभिवन्दनम् |  ४०   क
वनानि क्रमशस्तात सर्वाण्येवाभ्यगच्छत ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति