वन पर्व  अध्याय २७७

मार्कण्डेय़ उवाच

आसीन्मद्रेषु धर्मात्मा राजा परमधार्मिकः |  ५   क
व्रह्मण्यश्च शरण्यश्च सत्यसन्धो जितेन्द्रिय़ः ||  ५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति