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द्रोण पर्व
अध्याय ७४
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तस्य रथौघस्य मध्यं प्राप्य हय़ोत्तमाः |  १४   क
कृच्छ्रेण रथमूहुस्तं क्षुत्पिपासाश्रमान्विताः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति