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वन पर्व
अध्याय २७७
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मार्कण्डेय़ उवाच
अपत्योत्पादनार्थं स तीव्रं निय़ममास्थितः |  ८   क
काले परिमिताहारो व्रह्मचारी जितेन्द्रिय़ः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति