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शान्ति पर्व
अध्याय २७८
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भीष्म उवाच
तत्संय़ोगेन वृद्धिं चाप्यपश्यत्स तु शङ्करः |  २५   क
महामतिरचिन्त्यात्मा सत्यधर्मरतः सदा ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति