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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
त्वत्प्रसादाच्च मे देव स्मृतिर्न परिहीय़ते |  १२५   क
द्रुतमन्तः शरीरे ते सततं परिधावतः ||  १२५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति