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शान्ति पर्व
अध्याय २७८
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युधिष्ठिर उवाच
कथं चाप्युशना प्राप शुक्रत्वममरद्युतिः |  ४   क
ऋद्धिं च स कथं प्राप्तः सर्वमेतद्व्रवीहि मे ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति