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वन पर्व
अध्याय २७८
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अश्वपतिरु उवाच
गुणैरुपेतं सर्वैस्तं भगवन्प्रव्रवीषि मे |  २१   क
दोषानप्यस्य मे व्रूहि यदि सन्तीह केचन ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति