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वन पर्व
अध्याय २७८
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सावित्र्यु उवाच
दीर्घाय़ुरथ वाल्पाय़ुः सगुणो निर्गुणोऽपि वा |  २६   क
सकृद्वृतो मय़ा भर्ता न द्वितीय़ं वृणोम्यहम् ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति