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वन पर्व
अध्याय २७८
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नारद उवाच
क्व गताभूत्सुतेय़ं ते कुतश्चैवागता नृप |  ४   क
किमर्थं युवतीं भर्त्रे न चैनां सम्प्रय़च्छसि ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति