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वन पर्व
अध्याय २७८
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मार्कण्डेय़ उवाच
विनष्टचक्षुषस्तस्य वालपुत्रस्य धीमतः |  ८   क
सामीप्येन हृतं राज्यं छिद्रेऽस्मिन्पूर्ववैरिणा ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति