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शान्ति पर्व
अध्याय २७९
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भीष्म उवाच
दुष्कृते सुकृते वापि न जन्तुरय़तो भवेत् |  २०   क
नित्यं मनःसमाधाने प्रय़तेत विचक्षणः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति