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वन पर्व
अध्याय २७९
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मार्कण्डेय़ उवाच
दत्त्वा त्वश्वपतिः कन्यां यथार्हं च परिच्छदम् |  १६   क
यय़ौ स्वमेव भवनं युक्तः परमय़ा मुदा ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति