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वन पर्व
अध्याय २७९
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मार्कण्डेय़ उवाच
सत्यवानपि भार्यां तां लव्ध्वा सर्वगुणान्विताम् |  १७   क
मुमुदे सा च तं लव्ध्वा भर्तारं मनसेप्सितम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति