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वन पर्व
अध्याय २७९
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मार्कण्डेय़ उवाच
गते पितरि सर्वाणि संन्यस्याभरणानि सा |  १८   क
जगृहे वल्कलान्येव वस्त्रं काषाय़मेव च ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति