वन पर्व  अध्याय २७९

मार्कण्डेय़ उवाच

श्वश्रूं शरीरसत्कारैः सर्वैराच्छादनादिभिः |  २०   क
श्वशुरं देवकार्यैश्च वाचः संय़मनेन च ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति