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वन पर्व
अध्याय २७९
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मार्कण्डेय़ उवाच
तत्रापश्यन्महाभागं शालवृक्षमुपाश्रितम् |  ४   क
कौश्यां वृस्यां समासीनं चक्षुर्हीनं नृपं तदा ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति