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अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
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च्यवन उवाच
वरं गृहाण राजर्षे यस्ते मनसि वर्तते |  ३३   क
तीर्थय़ात्रां गमिष्यामि पुरा कालोऽतिवर्तते ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति