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द्रोण पर्व
अध्याय १६२
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सञ्जय़ उवाच
शरशक्त्यर्दिताः क्लान्ता रात्रिमूढाल्पचेतसः |  १७   क
विष्टभ्य सर्वगात्राणि व्यतिष्ठन्गजवाजिनः |  १७   ख
संशुष्कवदना वीराः शिरोभिश्चारुकुण्डलैः ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति