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शान्ति पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्त्वज्ञो जनको राजा लोकेऽस्मिन्निति गीय़ते |  ३६   क
सोऽप्यासीन्मोहसम्पन्नो मा मोहवशमन्वगाः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति