आदि पर्व  अध्याय २८

सूत उवाच

रजश्चोद्धूय़ सुमहत्पक्षवातेन खेचरः |  ५   क
कृत्वा लोकान्निरालोकांस्तेन देवानवाकिरत् ||  ५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति