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शान्ति पर्व
अध्याय २६३
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व्राह्मण उवाच
अय़ं न सुकृतं वेत्ति को न्वन्यो वेत्स्यते कृतम् |  ३१   क
गच्छामि वनमेवाहं वरं धर्मेण जीवितुम् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति