वन पर्व  अध्याय २१

वासुदेव उवाच

प्रय़ातोऽस्मि नरव्याघ्र वलेन महता वृतः |  १३   क
कॢप्तेन चतुरङ्गेण वलेन जितकाशिना ||  १३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति